Somnath Temple : Gujarat Travel (सोमनाथ मन्दिर : गुजरात )
परिचय तथा परिस्थिति :
विश्व में बारह ज्योतिर्लिंग है l हर भारतीय की इच्छा और कोशिश होती है, कि जीवन में एक बार इन पवित्र स्थलों के दर्शन जरुर किए जाएँ l सोमनाथ मन्दिर बारह ज्योतिर्लिंगों में सबसे पहला स्थान रखता है l सोमनाथ पहुँचने के लिए सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन बेरावाल है, जो मन्दिर से 6.00 km. दूर है l बेरावल , दिव से 85 km. अहमदाबाद से 425 km. मुंबई से 880 km. पुणे से 1000 km. और राजकोट से 195 km. की दुरी पर स्थित है l इसी प्रकार सड़क द्वारा भी हर जगह से आसानी से जाया जा सकता है l हवाई जहाज से सबसे नजदीकी हवाई अड्डा दिव है l इस के सिवा राजकोट और अहमदाबाद से भी जा सकते हैं l
एक किवदन्ती के अनुसार इस मन्दिर का निर्माण, चंद्रमा देवता ने खुद को शाप मुक्त करने के लिए किया था l प्राचीन ग्रंथों के अनुसार ( "खासकर इसका विवरण अथर्ववेद में भी मिलता है" ) चंद्रमा ने दक्ष प्रजापति की 27 कन्याओं से विवाह किया था, ( जिन्हें हम आज के सन्दर्भ में नक्षत्र के रूप में देखते हैं ) मगर चंद्रमा ने बाकि पत्नियों की अवहेलना की, तथा रोहिणी को अधिक प्यार व सम्मान देना शुरू किया l तब बाकि कन्याओं ने अपने पिता राजा दक्ष से इसकी शिकायत कर दी l राजा दक्ष ने चन्द्रमा को समझाने का प्रयास किया l परन्तु जब चन्द्रमा ने कहना नहीं माना तो, उन्होंने चंद्रमा को शाप दे दिया ,कि अब से तुम हर दिन अपनी कान्ति ( चमक ) को घटते हुए देखोगे l और इस प्रकार चंद्रमा का तेज हर दिन घटना शुरू हो गया l अपनी ये हालत देख चंद्रमा ने शिव जी की आराधना शुरू कर दी l भगवान भोले नाथ ने प्रसन्न हो कर दर्शन दिए, और कहा कि वह शाप मुक्त तो नहीं कर सकते, मगर वह इस तरह की व्यवस्था कर सकते हैं ,कि 15 दिन आपकी कान्ति घटती रहेगी , मगर 15 दिन के बाद यह बढ़ेगी भी l इए प्रकार कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष का आरम्भ हुआ l अन्तत:शाप का निवारण होने के पश्चात चन्द्रमा ( एक नाम सोम भी ) ने उसी तपस्या स्थल पर एक शिवलिंग की स्थापना कर दी l इस प्रकार इसका नामकरण सोमनाथ पड़ा l ऐसी भी मान्यता है कि चन्द्रमा ने मन्दिर का निर्माण सोने की धातु से किया था l फिर त्रेतायुग युग में रावण ने इसका निर्माण चांदी से किया l द्वापरयुग में श्री कृष्ण ने चन्दन की लकड़ी से इसका निर्माण किया था l सोमनाथ महादेव का शिवलिंग प्राचीन समय से ही अपने दिव्य चमत्कारों के लिए जाना जाता है। भगवान महादेव का ये अत्यंत सिद्ध स्थान है। यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में चंद्र नीच का है, या चंद्र के कारण दोष बना हुआ है, तो इनके दर्शन और पूजा ,उसे इस पीड़ा से मुक्ति मिलती है। ऐसा भी उल्लेख है, कि यह मन्दिर ईसा पूर्व भी अस्तित्व में था l उसके बाद सातवीं सदी में वल्लभी के मैत्रक राजाओं ने इसका पुननिर्माण किया था l इस मन्दिर को आठवीं सदी में सिंध के अरबी गवर्नर जुनायद ने नष्ट कर दिया था l उसके पश्चात 815 ईस्वी में प्रतिहार के राजा नागभट्ट ने इसका पुननिर्माण किया l इस मन्दिर की भव्यता और समृधी दूर-दूर तक प्रसिद्ध थी l जब अरब देश से एक यात्री "अल-बरुनी" भारत आया तो उस ने अपने यात्रा वृतांत ( उस समय का ब्लॉग ) के अंतर्गत अपनी कथा में भारत और इसके गौरवशाली इतिहास व समृधी के विषय में लिखा l यह सब सुन कर क्रूर अफगानी शासक "महमूद गजनवी" ने सन 1025 में इस मन्दिर की सम्पदा को लूटने के इरादे से 5000 सैनिकों को लेकर मन्दिर पर आक्रमण कर दिया , और लगभग 50,000 लोगों की हत्या कर, इसकी सारी सम्पति लूट ली , तथा मन्दिर को नष्ट कर दिया l ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार, सोमनाथ का मूल ज्योतिर्लिंग गर्भगृह में हवा में स्थापित था, जो न जमीन को छूता था और न छत को l कहा जाता है कि मंदिर की छत और गर्भगृह में विशेष चुंबकीय (Magnetic) पत्थरों का उपयोग किया गया था, जिसके चुंबकीय बल (Magnetic force) से यह चमत्कार संभव होता था। महमूद गजनवी ने जब इसे देखा, तो वह दंग रह गया था l उसने इसकी भव्यता से परेशान होकर पुरातन शिवलिंग भी खण्डित कर दिया l यह भी कहा जाता है कि आगरा के किले में जो दरवाजे हैं, वह सोमनाथ मन्दिर के ही द्वार है l लगभग 200 वर्षों तक यह खण्डहर ही रहा, उसके पश्चात सन 1297 में गुजरात के राजा भीम और मालवा के राजा भोज ने इसका पुननिर्माण किया l यह ऐसा मन्दिर है, जिसकी भव्यता हर किसी को आकर्षित करती है l यह आज भी सच है ,और तब भी था l इसकी ख्याति को सुन कर सन 1706 में ओरंगजेब ने इसे बुरी तरह लूटा और तहस-नहस कर दियाl
सोमनाथ मन्दिर को बार-बार , 17 बार लूटा गया, खंडित किया l साथ ही इसका जीर्णोद्धार भी होता रहा यह सिलसिला सदियों तक चलता रहा l सोमनाथ मन्दिर का विरोध मुसलमानों और आतताइयों ने तो किया ही, बल्कि जवाहरलाल नेहरु ने भी इसका पुरजोर विरोध यह कह कर किया कि यह हिन्दुतत्व्वाद को बढ़ावा देगा l ( यह बात कन्हैयालाल लाल मुन्शी ने अपनी किताब ‘पिलग्रिमेज टू फ़्रीडम’ में लिखा है
सोमनाथ मन्दिर के नए प्रारूप का सपना नवम्बर 1947 में सरदार पटेल ने तब संजोया जब वह प्रभास पाटन के दौरे पर थे l उनका मानना था कि सोमनाथ मन्दिर सिर्फ प्राचीन स्मारक ही नहीं, बल्कि प्रत्येक भारतीय का पूजा स्थल है l इसका निर्माण राष्ट्रीयता की पहचान है l सन 1948 तक इसे प्रभास पाटन के नाम से भी जाना जाता था l यह जूनागढ़ रियासत का मुख्य नगर हुआ करता था l विलय के बाद स्थान वेरावल में हो गया l मन्दिर की आधारशिला सौराष्ट्र के पूर्व राजा “ राजा दिग्विजय सिंह “ ने 8 मई 1950 को रखी थी l सोमनाथ का यह भव्य मन्दिर 11 मई 1951 में स्वतंत्र भारत के पहले राष्ट्रपति श्री डा.राजेन्द्र प्रसाद ने पवित्र ज्योतिर्लिंग स्थापित कर राष्ट्र को समर्पित किया था l इस भव्य मन्दिर की परिकल्पना में कन्हैयालाल लाल मुन्शी और सरदार पटेल का प्रयास प्रमुख था l आज का नवीन सोमनाथ पूर्णतया 1962 में तैयार हुआ l इसके मुख्य द्वार जामनगर की राजमाता ने अपने पति दिग्विजय सिंह की स्मृति में निर्मित करवाए थे, जिन्हें दिग्विजय द्वार कहा जाता हैl
पुरातन मन्दिर के समस्त विध्वन्स के पशचात 1782 में महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने इसके समीप ही एक मन्दिर का निर्माण करवाया था, जहाँ भगवान शंकर की पूजा को यथावत जारी रखा गया था l
मन्दिर के प्रांगण में बाण स्तम्भ भी स्थापित है l ( हम दो बार जा कर भी इसे देख नहीं सके ) इसमें लगा हुआ तीर इस प्रकार दिशा प्रदान करता है, कि यहाँ से दक्षिणी ध्रुव तक कहीं भी धरती नहीं है l यह भारत के प्राचीन खगोलशास्त्र के उन्नत ज्ञान को दर्शाता है l तब कोई GPS नहीं था, न ही किसी ने इतनी लम्बी यात्रा की होगी, तो कैसे इन सब की कल्पना की गई होगी l
मन्दिर के प्रांगण में एक और मूर्ति है ,जो हाथ में भाला लिए घोड़े पर सवार है l यह मूर्ति वीर पराक्रमी हमीर सिंह गोहिल की है जिन्होंने मात्र 16 साल की उम्र में जफ़र खान की विशाल सेना को नाको चने चबाने पर विवश कर दिया था, मात्र 200 राजपूत योधाओं के साथ मुकाबला किया था l बाद में भील सरदार वेगड़ा जी ने अपने 1200 योधाओं के साथ मिल कर हमीर जी का साथ दिया और सभी ने वीर गति पाई l हमीर सिंह जी की मुर्ति सिर्फ इसलिए ही नहीं लग गई, कि उन्होंने वीर गति प्राप्त की l कहा जाता है कि 11 दिन तक चले युद्ध में जफ़र खान ने धोखे से हमीर जी का सिर काट दिया, उसके बाद भी उनका धड़ युद्ध करता रहा l यह दृश्य देख कर दुश्मन की सेना में अफरा-तफरी मच गई थी l
हम बहुत भाग्यशाली हैं कि हमें भगवान भोलेनाथ के दर्शन करने का सौभाग्य दो बार मिला l पहली बार 16 जनवरी 2018 को दिन के 2.00 बजे हम दोनों के साथ-साथ दो और लोगों को,तथा दूसरी बार 16 जनवरी 2026 को 42 लोगों को भी दर्शन करवाए l इन दोनों बार की कहानी कुछ इस प्रकार है कि जब हम पहली बार जा रहे थे, तो मधु जी के बहन- बहनोई जो कुछ समय पहले ही सरकारी नौकरी से सेवानिवृत्त हुए थे, को जैसे ही पता चला कि हम गुजरात जा रहे हैं , तो उधर से आदेश हुआ भाई हमारी भी टिकट करवाओ l हमारी टिकट ट्रेन में रिजर्व हो चुकी थी l ऐन मौके पर उनकी टिकट सम्भव न हो सकी l फिर हवाई जहाज की टिकट करवाई और ट्रेन की रद्द l अभी जब दूसरी बार जाना हुआ तो हमारे कुछ पुराने घुमक्कड़ साथी जैसे पदम ठाकुर जी और महेंद्र शर्मा जी बोले गुजरात वाले ज्योतिर्लिंग करने है, प्रोग्राम बनाओ l हमने कहा, भई हम तो जा चुके हैं, अब मन और समय भी नहीं है l मगर दबाव था नहीं चलना ही है l तो तय हुआ एक बस ले चलते हैं, कुछ और पुराने घुमक्कड़ों को भी घुमा लाते हैं l सारा जोड़-घटाव करके शिमला से 18,500 रु पर सवारी का अन्दाज बैठा l और निकल पड़े l इस बार हमने खुद ज्यादा पंगा नहीं लिया, एक नए लड़के ( मोहित ) को कमांड सौंपी ,उसी ने बस बुक की, रहने और खाने का इंतजाम भी किया l बाकी रूट मैप की जिम्मेदारी मैंने और पदम ने सम्भाली अकेले यात्रा करने का अलग मजा है, आप हर एक-एक पल का इस्तेमाल अपने तरीके से कर सकते हैं l जबकि 50 लोगों के साथ, सबको साथ ले कर चलना पड़ता है l ( हम दो मतलब एक दिमाग ) ( 50 लोग 50 दिमाग ) सब आसान तो नहीं होता मगर जहाँ इतने लोग होते हैं वहां मनोरंजन के पल ज्यादा होते हैं l


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