परिचय और परिस्थिति :
प्राचीन शूलपानेश्वर मंदिर अब सरदार सरोवर बांध के नीचे स्थायी रूप से डूब गया है । यह मन्दिर नागर-द्रविड़ वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध था l यह ऐतिहासिक स्थल नर्मदा परिक्रमा मार्ग पर एक महत्वपूर्ण तीर्थस्थल था। बाद में इस मंदिर को स्थानांतरित करने के लिए गोरा गांव में एक नया मंदिर बनाया गया। मूल रूप से यह महाराष्ट्र और गुजरात की सीमा पर मणिबेली के पास नर्मदा और देवगंगा नदियों के संगम पर स्थित था l
इस मन्दिर को स्वयंभू कहा जाता था, और इसका उल्लेख स्कंदपुराण और शिवपुराण में भी मिलता है । ऐसा माना जाता है कि यहीं पर शिव ने अपने त्रिशूल को शुद्ध किया था, इसलिए नर्मदा परिक्रमा में यह एक पवित्र स्थल है।
इस मंदिर में एक छोटा चबूतरा, एक बड़ा शिखर और एक वर्गाकार गर्भगृह था, जिसका जीर्णोद्धार 1772 ईस्वी में विंध्यचल के राजा “राजसिंह” के शासनकाल के दौरान किया गया था। सरदार सरोवर बांध के बढ़ते जलस्तर के कारण मूल, पुराना मंदिर जलमग्न हो गया था। गोरा गांव में स्टैच्यू ऑफ यूनिटी के पास एक नया, सुव्यवस्थित मंदिर बनाया गया है , जिसमें मूल शिवलिंग स्थापित हैं।
नर्मदा बचाओ आंदोलन ने ऐसे स्थलों के डूबने के खिलाफ विरोध प्रदर्शन भी किया, जिसमें साधना ताई आमटे जैसे कार्यकर्ताओं ने 1990 के दशक में इसके अंतिम रूप से डूबने से पहले उस स्थल का दौरा किया था l 1994 में यह नर्मदा बांध में जलमग्न हो गया था, जिसे बाद में दुसरे स्थान पर पुनर्निर्मित किया गया। नया मन्दिर गुजरात के नर्मदा जिले में केवड़िया (एकता नगर) के पास, सरदार सरोवर बांध के नजदीक स्टेचू ऑफ़ यूनिटी की पीठ के पीछे ( सरदार पटेल की पीठ ) शान्त वातावरण में बनाया गया है । यह स्थान नर्मदा नदी के तट पर स्थित है, और अपने शांत वातावरण, आध्यात्मिक महत्व और वार्षिक मेले (चैत्र माह में) के लिए प्रसिद्ध है।
मुख्य विशेषताएं:
- पौराणिक महत्व: यह स्थान पुराणों और महाभारत में भी उल्लिखित है।
- यह केवड़िया रेलवे स्टेशन से लगभग 7 किमी की दूरी पर है।
- चैत्र माह में यहां तीन दिवसीय मेला लगता है, जिसमें गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान और मध्य प्रदेश से बड़ी संख्या में भक्त आते हैं।
- निकटतम हवाई अड्डा: वडोदरा (75 किमी)।
- निकटतम रेलवे स्टेशन: केवड़िया (एकता नगर) (7 किमी)।
- प्रमुख शहर: राजपीपला (21 किमी)।
- यह क्षेत्र मुख्य रूप से 'वासवास' जनजाति द्वारा बसा हुआ है, जिनका जीवन और आवास जंगल के साथ गहराई से जुड़ा हुआ है यह पूरा क्षेत्र पेड़ पौधों से भरा और काफी घना है इस जंगल को हिडम्म्बा वन के नाम से जाना जाता है
हम शायद यह सुन्दर और शान्त स्थल देख ही न पाते अगर हमारे चालक शैलेश भाई न होते इस पुरी गुजरात यात्रा में शैलेश जी ने हमें इतना कुछ दिखाया जो हमारी लिस्ट में था ही नहीं l हमने बस उन्हें अपना रूट बताया उस के रास्ते में जितने भी दर्शनीय स्थल है, वह हमें दिखाते रहे, और एक कुशल गाइड की तरह हर बारीकी से समझाया भी l धन्यवाद शैलेश भाई l
नये मन्दिर का निर्माण पुराने जलमग्न हो चुके मन्दिर की तर्ज पर ही किया गया है, तथा उसी प्राचीन शिवलिग को यहाँ दौबार स्थापित किया गया है l जब हम यहाँ पहुंचे तो आठ दस लोग ही वहां थे, जो शायद स्थानीय लोग थे l मन्दिर के पुजारी बाहर धूप में खड़े थे, मगर जैसे ही हमने मन्दिर में प्रवेश किया तो एक पुजारी जी झट से मन्दिर में आए और हमें तिलक लगा कर प्रशाद दिया l उन्होंने ही हमें उपरोक्त जानकारी उपलब्ध करवाई, तथा बाकि की जानकारी को गूगल बाबा ने पुष्ट किया इसके बाद हम यहाँ आधा घंटा और रुके, मगर इतनी देर में वहां कोई भी और श्रद्धालु नजर नहीं आया
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| महामंत्र |
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| पुराने पुल से लिया गया चित्र |
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| शुल्पानेश्वर महादेव का नव-निर्मित मंदिर |
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| जय भोलेनाथ |
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| ॐ नम: शिवाय |
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| पुराने मंदिर में स्थापित शिवलिंग का ब्लैक & वाइट चित्र |
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| अब सिर्फ यादगार :मंदिर डूबने से पहले का रंगीन चित्र |
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| थोड़ी सी भक्ति मैं भी कर लूँ |
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| यहाँ अंदर -बाहर फोटो खींचने पर कोई पाबन्दी नहीं है |











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