Ayodhyapuram : Adinatha jain Temple: Gujarat Travel (अयोध्यापुरम : गुजरात )
परिचय तथा परिस्थिति :
अयोध्यापुरम हमारी घुमक्कड़ी की सूचि में नहीं था l ये तो बस दिव वाले रास्ते में था, तो हमारे चालक शैलेश भाई ने सारंगपुर से निकलते ही इसकी कहानी सुनानी शुरू कर दी l मैं यहाँ यह बात बड़े गर्व से लिख रहा हूँ, कि शैलेश भाई को सौराष्ट्र के सभी घुमक्कड़ी वाले स्थानों की भरपूर जानकारी है, और हर जगह का इतिहास भी अच्छे से पता है l बहुत सी कहानियां तो उन्होंने अपनी माता जी से सुनी है, ऐसा उन्होंने बहुत बार बताया l उनकी बातें सुन कर लगा वह अपनी माँ से बहुत प्यार करते हैं l दिन 19 दिसम्बर 1918 सुबह 9.30 बजे हमने सारंगपुर से प्रस्थान कर लिया था, आज की हमारी मंजिल थी, दिव किला, जो यहाँ से 215 km. होने वाला थाl
अयोध्यपुरम धाम अहमदाबाद-पालिताना राजमार्ग पर वल्लभीपुर से लगभग 8 किमी की दूरी पर स्थित है। भावनगर शहर से इसकी दूरी लगभग 48 किमी है।
यहाँ पहुँचने के लिए अहमदाबाद और वडोदरा से धन्धुका होते हुए वल्ल्भिपुर जाया जा सकता है l
अयोध्यापुरम आदिनाथ जैन तीर्थ के नाम से जाना जाता है। यह मंदिर गुजरात के भावनगर जिले में वल्लभीपुर के समीप स्थित है।
मुख्य आकर्षण और विशेषताएँ :
- मंदिर में प्रथम जैन तीर्थंकर भगवान आदिनाथ (ऋषभदेव) की 23 फीट ऊंची प्रतिमा विराजमान है। यह पद्मासन (बैठी हुई) मुद्रा में विश्व की सबसे बड़ी जैन प्रतिमाओं में से एक मानी जाती है, जिसके लिए इसे गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में भी स्थान मिला है।
- मंदिर के मुख्य शिखर की ऊंचाई 108 फीट है। इसकी नक्काशी और कलात्मक कार्य बहुत ही सुंदर और भव्य है।
- इस आधुनिक तीर्थ का निर्माण जैन आचार्य श्री अभयसागरजी महाराज साहब की प्रेरणा से हुआ था।
पूज्य बंधु बेलड़ी आचार्यदेव जी की दिली इच्छा थी कि अयोध्या में इस मन्दिर का निर्माण किया जाये l ( प्राचीन जैन धर्म में अयोध्या को साकेत धाम के नाम से जाना जाता था ) मगर बाबरी मस्जिद प्रकरण और गुजरात सेदूर, तथा जैन बस्ती न होने के कारण ये कार्य सम्भव नहीं हो पा रहा थाl
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1999 में एक अद्भुत घटना हुई, जब आचार्यदेव श्री
जिनचंद्रसागरसूरी जी महाराज तथा
आचार्यदेव श्री
हेमचन्द्रसागरसूरी जी महाराज चातुर्मास भ्रमण पर थे l जब वह वल्ल्भिपुर के पास से
गुजर रहे थे, तो एक बहुत बड़ा सांप सड़क से निकल कर दूसरी तरफ जा रहा था, तभी वहां से
कोई वाहन भी निकल रहा था, तो वह उस वाहन की चपेट में आकर सांप घायल हो गया l दोनों आचार्यदेवश्री ने देखा कि इस हादसे में सर्प के
शरीर के बीच का भाग वाहन से कुचल जाने से सड़क के बीच में चिपक गया है, और सांप अपना जीवन बचाने
के लिए बुरी तरह से तड़फ रहा है l अब इस जीव का जीवन बचाने के लिए दोनों आचार्यदेवश्री वहीं रुक गये, और जैसे तैसे घायल, लहूलुहान
सांप को सावधानीपूर्वक सड़क किनारे सुरक्षित स्थान पर ले गए, जिसके
बाद आचार्यदेवश्री ने उस सांप की सदगति के उद्देश्य से नवकार महामंत्र सुनाया l आचार्यदेवश्री के महामंत्र से कुछ ही क्षणों में सांप ने अपने प्राण छोड़ दिए । उसके पश्चात् दोनों आचार्य पतिलाणा की ओर प्रस्थान कर गए l
पालीताणा में जब दोनों आचार्यदेवश्री चातुर्मास सम्पन्न करवाकर वापिस इसी रास्ते से आ रहे थे, तभी उसी स्थान पर जहाँ उन्होंने सर्प का संस्कार किया था, कुछ दिव्य अनुभूति हुई l संकेत प्राप्त हुआ कि जो कार्य अयोध्या में करना चाह रहे हो, उसे यहीं पर सम्पन किया जाए, और इस स्थान का नाम अयोध्यापुरम रखो क्योंकि यह स्थान शत्रुंजय गिरिराज जी का हैl
अत: दोनों आचार्यदेवश्रीने संकल्प लिया और मन्दिर का निर्माण शुरू हो गया l उनकी इच्छा थी कि यहाँ दादा आदिनाथ की एक विशाल प्रतिमा स्थापित की जाये l मगर यह इतना आसान न था पहले तो इतना विशाल पत्थर और फिर उसे राजस्थान से यहाँ पहुँचाना, फिर तराशना कुछ भी आसान न था l परन्तु कहते हैं जहाँ चाह वहां राह l मनुष्य अगर कुछ ठान ले तो सफलता हमेशा कदम चूमती है l हर सम्भव स्रोत से खोज करवाई गई, आखिरकार जयपुर से 70 km. दूर खदान में इतना विशाल एक पत्थर मिल ही गया l हमे बताया गया कि 150 पहिये वाले ट्राले पर इसे यहाँ तक लाया गया था l रास्ते में न जाने कितने पुल मजबूत करने पड़े, बहुत जगह पर बिजली की तारें खोलनी पड़ी, रेल की पटरियों को मजबूत किया गया, तब जा कर यह विशाल शीला यहाँ तक पहुंची l फिर इसको प्रथम जैन तीर्थंकर भगवान आदिनाथ (ऋषभदेव) की 23 फीट ऊंची के रूप में तराश कर स्थापित किया गया, जो एक वर्ड रिकॉर्ड है, और इसका नाम गिनीज बुक में सबसे बड़ी पदमासन में बैठी जैन मूर्ति के लिए शामिल किया गया है l
यह जगह ज्यादा भीड़-भाड़ वाली नहीं है, परन्तु बहुत ही शान्त है l अन्दर भी हमें दो स्वामी जी मिले उनसे ही कुछ जानकारी इकठा की और प्रस्थान कर गए l
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| आदिनाथ जैन मंदिर का मुख्यद्वार |
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| आदिनाथ जैन मंदिर की पहचान हाथ में घंटा |
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| इन्हीं की याद में बना है मंदिर |
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| अन्दर फोटो खींचने की मनाही है , बाहर से ही कोशिश की |
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| मंदिर के बाहर लगा बोर्ड |
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चित्र गूगल सेसाभार फोटो गूगल से साभार |







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